भगवा की आनोबान शान वो इक प्रचंड सी ज्वाला था

महावीर पुरुष महाराणा प्रताप जी की याद में अपने दिल की भावनाएँ व्यक्त करती मेरी रचना –
(अवश्य पढे )

रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
whatsapp- 9675426080

“भगवा की आनोबान शान वो इक प्रचंड सी ज्वाला था”

उम्मीदें थीं सब धुंधली जब युग दुष्कृत्यों से काला था
ऐसे में बनकर दीप जला वो शूरवीर मतवाला था
रथ सनातनी का संचालक मानवता का रखवाला था
भगवा की आनोबान शान वो इक प्रचंड सी ज्वाला था

जिसका सेवक था इक तुरंग वो जैसे पवनपुत्र चेतक
श्री हनुमान से दास थे, गज वो रामप्रसाद,अश्व हेतक
था तेज तेग का भी अद्भुत,हर बार अचूक निशाना था
जितना था भार शत्रु का उतना,उसका ताना बाना था
अपने अदम्य साहस से उसने हर विपत्ति को टाला था
भगवा की आनोबान शान ———————–

वो राजवाडे के चैनोसुख और छोड़ के भोग विलासो को
जंगल में जंग जिया था छोड़ के,वो मखमली लिवासों को
उसने हल्दीघाटी का घाट-घाट रक्तिम कर डाला था
उसके डर से शत्रु जपता उसके ही नाम की माला था
वो क्षीर सिंधु का प्रखर ज्वार,हिम की चट्टान शिवाला था
भगवा की आनोबान शान ———————-

मुगलों से खौफज़दा हो जब हिंदू छुप-छुप कर सोया था
वो दिनकर बन सबके दिल में आशा के अंकुर बोया था
पर साथ किसी ने दिया नहीँ सबका जमीर ही खोया था
उस महावीर की शैय्या पर उसका ही कातिल रोया था
वो था सपूत सच्चा भारत माता का प्यारा लाला था
भगवा की आनोबान शान ————————

उसके रथ की अब बागडोर जिस शासक के कंधों पर है
वो भी अब लगता लगा हुआ कायरता के धंधों पर है
पर हार नहीँ मानेंगे हम शत्रुओं का रक्त बहायेंगे
उसका रथ जो राहों पर है मंजिल तक हम पहुचाएगे
ये “आग” कहे मेरा भी है जो उसका ख्वाब निराला था
भगवा की आनोबान शान ————————

—————–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
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