एक कमरा मेरे दिल का…….. विकास पंडित

एक कमरा था मेरे दिल का..
तुम्हे पता है !
मै कब से बैठा था दरवाजे पर..

कितनो अरसो से..
उस दरमिया मैने एक पल भी
आंखे ना झपकी..
ताकी तुम!!…. तुम
कहीं निकल ना जाओ..!
पैर तुम्हारे ना जाने कितनी बार
भागे थे कमरे से बाहर..
पर मेरी बेशरम आदत से
वाकिफ थे तुम तो..
हर बार हाथ पकड़े मैने
कई बार तो पैर भी पकडे..
पर जाने नहीं दिया
तुमको कतई भी..
एक पल के लिए भी बाहर..

एक कमरा था मेरे दिल का..
तुम्हे पता है !
मै कब से बैठा था दरवाजे पर..

कई बार तो रोका होगा
शायद मेरे आंसुओ ने..
तो कई बार दिल मे तुम्हारे
शायद जाग गयी होगी दरियादिली..
इसलिए रुक जाते तुम
कि चलो कुछ और समय बिता लें..
पर पता है तुम्हे..!!
बाहर बैठा मै हमेशा
खौफ मे ही जिया किया..
क्योकी जो पैर देख चुके थे
बाहर का जमाना..
उन्हे रोकने की ताकत
मेरे प्यार मे ना थी शायद..
पर तब भी एक हसरत के साथ..
लिए बस तुम्हारे खयाल..
तुम्हारी सूरत लिए बाहर..

एक कमरा था मेरे दिल का..
तुम्हे पता है !
मै कब से बैठा था दरवाजे पर..

हर बार की तरह
पर इस बार कुछ हुआ अलग..
दरवाजे के दरमिया रो रो कर
जो फिसलन मैने बना दी थी..
उसी पर पैर ऐसे फिसले तुम्हारे
कि चाह कर भी ना पकड़ सका..
सच!! पहली बार गिरते देखा
मैने खुद की नजरो से तुम्हे..
ये बात और थी
कि लोग पहले ही कहते थे मुझे..
समझाते थे नसीहते भर भर कर..
कि क्यो जी रहे हो उसमें
जिसके लिए कोई वजूद नहीं तुम्हारा..
पर तुम तो कैद थे मुझमें..
क्योंकी..

एक कमरा था मेरे दिल का..
तुम्हे पता है !
मै कब से बैठा था दरवाजे पर..

पर इस बार कुछ अलग है..
सच वो होगा जो ना सोचा था मैने
शायद वो जो तुम भी ना सोचो..
लेकिन दरवाजा दिल का अब खुलेगा !!
अब मैं निकालूंगा तुम्हे..

दिन की पहली फोन कॉल से..
फेसबुक की हर एक वाल से..

अपने मोबाईल से..
चेहरे की स्माईल से..

लैपटोप के पर्सनल फोल्डर से..
टेबल पे पड़े उस प्रिंटिड पेन होल्डर से..

ओनलाईन बैंकिग के पासवर्ड से..
लाइफ के हर छुपे वर्ड से..

अपनी पुरानी डायरी से..
अपनी हर एक शायरी से..

बेवक्त आने वाले खयालो से..
तुमसे पूछने वाले हर सवालो से..

हर लम्हे की ललक से..
तुम्हारी रैबिट स्माईल झलक से..

स्टडी टेबल की दिवार से..
अपने दिल के प्यार से..

रात की आखिरी फोन कॉल से..
अपने पूरे दिन के महौल से..

सोने से पहले के खयालो से..
जागने के बाद के सवालों से..

सुबह की पहली जम्हाई से..
रात की सूनी तन्हाई से..

मेरी लिखी उन सारी कविताओ से..
मेरी सारी अधूरी रह गई आशाओ से..

और जी भर के रोऊंगा..
फूट फूट कर !!
ताकी धुल जाए जमी..
मेरे उस सूने कमरे की..
और फिर मैं सूकू से जी सकू..
अपनी जिन्दगी..
और ये ना कह सकू दोबारा..
कि……….!!!

एक कमरा था मेरे दिल का..
तुम्हे पता है !
मै कब से बैठा था दरवाजे पर..

(मई 9, 2016)
ek kamara tha

3 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 09/05/2016
  2. C.M. Sharma babucm 10/05/2016

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