वो खयाल तेरे.,.,.,!! (एक उर्दू कश्मकश) चौथी नवम्बर २०११.,.,., समय रात्रि १०.०८

फजर का सूरुर है…
आंखों में नींद मेरे…
कश्मकश मे डूबा दिल…
लिये खयालात तेरे…

हसीन शाम थी वो…
हसीन थी रात भी…
हर जिया लम्हा…
रंगी मिजाज तेरे…

जौहर की चमक आयी…
खनक वो पायेजेब की छायी….
आवारा हुए कदम…
राह-ए-मोहब्बत में तेरे…

अशर की गिरफ्त में आसमां…
वक्त ले आया वो शमा…
अश्कों की जुबा हैं ये…
गवाही है सितम तेरे…

सवालों का पुलिन्दा है…
फजर का वो सूरूर भी…
अल्फाजों मे बया करता “विकास”…
रंग बेवफाई के तेरे…
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