मेरे अंदर की टीस….

मेरे अंदर की ये टीस
कितना किलसता हूँ अंदर से
सच पैमाना नहीं बता सकता
अंधेरा गर कर भी लूँ अपने इर्द गिर्द
पर जहन में उजाला ही उजाला है
उन उतराती यादों का
कितना लाचार और असहज हूँ मैं
पर ज़माने के लिए तो गुनेहगार हूँ खुद का
क्यों नहीं निकल आते इन सब से
क्यों झुलसते रहे हो उन्हीं वाकिफ लपटो में
क्या दिल को कोई दुश्मनी है शख्सियत से ?
निकल आओ कुएँ से
मैंने देखा है कईओ को निकलते
यही तंज़ सुनता आया हूँ ज़माने से
पर ज़रा आकर तो देखो
किस ज़िंदगी में जी रहा हूँ
यहाँ तनहाई भी अकेलापन महसूस करती है
पसरा है बस अंधेरा ही अंधेरा
कुछ भी तो नहीं चमकता इन काली रातों में
जिसे आशा की किरण ही समझ लूँ
बंद आँखों के पीछे का नज़ारा
सच लफ्ज नहीं है बया करने को
मैं तो बस खिलौना भर बन गया
जब जी चाहा जैसे चला दिया
पर बच्चे जैसा मासूम दिल ना था तुम्हारा
जो खिलौने को सहेज के रखते
सच बहुत परेशान हूँ
बस साँसें जीत रही हैं परेशानी से
पर हर चीज़ की एक मियाद होती है
ये तकलीफ भी टूटेगी
चाहे साँसें छूट जायें
क्योंकि ये जीना भी क्या जीना है
जिसमें मेरी ज़िंदगी की खुशियों की बागडोर
मैंने देदी तुम्हारे हाथों में
किस हद तक विचलित हूँ
क्या बीतती है मुझपे
बस ये मैं ही जानता हूँ
मेरे अंदर की ये टीस
कितना किलसता हूँ अंदर से
सच पैमाना नहीं बता सकता !
(23 Feb-2016)
12744138_949973301751089_8979152343609770234_n

5 Comments

  1. Swati naithani swati 08/05/2016
    • Vikas Pandit Vikas Pandit 09/05/2016
  2. C.M. Sharma babucm 09/05/2016
    • Vikas Pandit Vikas Pandit 09/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/05/2016

Leave a Reply