“हमेशा तो मैं तुम्हारे…झूठे भरोसे मे जीता आया हुं!!!!” MY POEM of 9th Nov.2012

हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!

तुमने जो मुझे दिखाया…
उसे मैने सच माना !
हर एक भ्रम को तुम्हारे…
वास्तविकता मैंने जाना !

तुम्हारे झूठ की धूप मे..
मैं एक छोटा साया हूं !
हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!

विश्वासघात का ये घिनोना खेल..
जो तुम खेलते आये हो
रिश्तो की परिपाटी को तुम.
सरे आम बेचते आये हो!

तुम्हारे इस व्यापार का…
तरीका ना समझ पाया हूं !
हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!

मुझे मेरा जीवन..
एसा लगता है यारो !
कही खो गये हो…
वो सपने हजारो !

तुम्हारे सच्चे शब्दो को…
मात्र स्वप्नो मे सुन पाया हू !
हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!

जीवन मे परखा है…
मैने हर दूजे इंसान को !
उसकी औकात से लेकर…
उसके कातिल ईमान को !

रूप की झूठी चमक में…
चौंधिंया कर तुम्हे परख ना पाया हूं !
शीशे को समझ हीरा…
उलटे मुह अपनी खाया हूं !
हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!

कमी रही मेरी…
करता रहा जो माफ !
झूठ की इमारत खडी थी सामने…
रास्ता था एक दम साफ !
बहरा होकर मस्तिष्क से..
अंदर के स्वाभिमान को न सुन पाया हूं !
झूठे महल के एश्वर्य को…
एक बार पुनःह्रदय से ना भूल पाया हूं !

तुम्हारे झूठ मे पुनः एक…
नया “विकास” लाया हूं !
हमेशा तो मै तुम्हारे…
झूठे भरोसे मे जीता आया हूं!!
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