हमसफर की यादों का सफर….!!! “पहली स्वसंवादित गद्य एवं पद्य रचना”… दिनांक ०२अगस्त,२०१२

हालांकि मै तभी लिखता, जब अन्दर से एक पुकार आती! क्योकी मेरी उलझनो का हल मुझे मिल गया था…पोईट्री!!!!!!!
और तो और जब वाकई मन करता तो लगता के साहित्यिक पद्य की पगडंडियो पर स्वतः ही चला जा रहा हूं…फिर मुझे उर्दू या हिन्दी का भी लिहाज ना रहता और बस मन कही शान्त कोने मे खडा जो देखता….उसे कलम स्वतः ही पन्नों पे पिरोती जाती….
बात तब की है जब मै अपनी सेमस्टर छुट्टियां पूरी कर अपने गंतव्य स्थल लौट रहा था,,मेरे दिमाग मे चल रही ध्वनि तरंगे रेल की पटरियो की तडतडाहट से कही जादा और जुदा सी कहानी बयां कर रही थी… क्योकी मेरे दिल मे बसी मेरे प्रेम की कहानी की नायिका,जिसके विचार आज भी न जाने क्यो मेरे समझ के पैमानो से बाहर थे… इस अवसाद का कारण थी!!ह्र्दय और मस्तिष्क पूर्णतया एक कवि रूप ले चुका था…हालांकि मेरे पास पर्याप्त स्त्रोत ना थे..एक डायरी मात्र ही थी…
कलम का पूर्णतय अभाव…
तभी मेरी नजर मेरे सहयात्री जो की मेरी सीट पर आके कुछ चन्द मिनटो के लिये बौठे थे, उनकी जेब मे रखे पेन पर पडी.,., उसी आशा किरण के साथ मैने उन से सामान्य पारिचायिक संवाद शुरु किया..
नाम श्री संतोष तिवारी…
शक्ल पर मूछें…जो की उनके कार्य का घोतक थी…
उम्र यही करीब २९ की होगी..पेशे से वे यू पीपी मे कांस्टेबल थे…
उनकी संवाद कुशलता उनके म्रदुभाषी एवं व्यवहारिक व्यक्तित्व की कहानी बया कर रही थी……
सज्जन से मुझे पेन मिल गया और मैं अपनी पीठ सीट से टिका पूर्णतय अनुकूल मुद्रा मे आगया…
आंखे खिडकियो से बाहर हल्की रात्रि के गुमनाम नजारे को ताकने लगी और स्वतः ही उंगलियो के साथ न्रत्य करती परायी लेखिनी(ठीक मेरी प्रेमिका की तरह) अल्फाजो से कश्मकश करने लगी….
और मुझे मेरी गद्य एवं पद्य की बेजोड बानगी प्राप्त हुई जिसे मै आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं
दिन २०१२ का २ अगस्त… समय रात्रि ८ः३९, उंचाहार एक्सप्रेस, स्थान कानपुर सेन्ट्रल!!!!!!!!!!!

सोचता हूं जब भी तुम्हारी सूरत को…
ये दिल धडक उठ्ता है…!
रूह के दर्मिया मेरे जहन मे…
यादो का सैलाब आ जुटता है…!!

सच्ची मुहब्बत का सितम था…
या तेरी रुसवाई का गिला…!
मोहब्बत वालो की ईन्तेहा तो बहुत थी…
बस तेरी मोहब्बत का मुकद्दर ना मिला…!!

रेल की खिडकियों के सहारे…
ये नजारे भी कुछ बया करते है…!
अरसो से रेल की खडखडाहट …
ये भी तो खामोशी से सहते है…!!

मेरे मोहब्बत की कटुता…
थोडा झेल ना सकी क्यूं तुम..!
जो बुनते थे ताउम्र “संग” रहने के ख्वाब..
वो चहकते अल्फाज क्यूं हैं गुम..!!

मेरे दिलो दिमाग मे इस पल..
अम्बार है लगा कई खयालो का..!
खता खुद की थी या मुकद्दर का खेल??
ढूढूं मैं गुमसुम जवाब सवालो का..!!

लगभग घंटा भर हो गया था…इन गुजरे दो चार दिनो की.पूरी स्म्रति पुनः जहन मे दौड चुकी थी.. आज तो ना जाने क्यो ये रेल के झटके कविता को एक वेग सा दे रहे थे पर बस एक चिंता जो की मेरे विचारो का अवमंदन कर रही थी…….

कुछ देर मे इन जनाब का..
गंतव्य स्थल आ जायेगा..!
मेरे विचारो को व्यक्त करने का..
एक मात्र स्त्रोत भी छिन जायेगा..!!

इससे पहले कि अर्धविराम लगे..
मेरे इस मनो व्यथा का..!
नींद की कुछ गोलियां लेकर..
समापन करता हूं व्यर्थ कथा का..!!

रेल एक अन्तरिम झटके के साथ रुकी…उन्नाव स्टेशन!!! मेरे सहयात्री से अलविदा!!
खिडकियो के बाहर से आती गर्म समोसो की आवाज ने ह्रदय एवि मस्तिष्क भंग किया… और मेरा समोसा प्रेम मेरे अवसाद से जीत गया….
मैने चार गर्म समोसे खाये पानी पिया…और “उसके” खयालो से कही दूर बचने के लिये एक नाईट्रावेट की टेबलेट खाकर एक मीठी नींद का गोता लगाते हुए स्वतः इस कविता का सुखद समापन किया!!!!

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