भारत माता

भारत माता

ये मत पूछो कहाँ-कहाँ पे
फूली और बढी हूँ मैं
हर जगह ठोक र लगी
ओर———–
ओंधे मुँह गिरी हूँ मैं
जब-जब फूली और बढी मैं
नजर लगी मुझे लोगों की
मैं हूँ एक तुच्छ सी नारी
अपने भाग्य की मारी
जब बढ़ी सिंधु सभ्यता
बहुत खुश थी मैं बेचारी
फि र अचानक जाने कैसा
एक बवंडर ऐसा उठा
दब कर शांत हो गई वह नगरी
जिस पर मुझे घमंड था
फि र मुर्झा कर बैठ गई मैं
गम का बादल छाया था
मगर उस गम के बादल में भी
एक अजीब सी थी नमी
टूट कर बरस पड़ा वो
फिर से अंकुर फूटने लगा
फि र से मैं लहलहाने लगी
फि र से गीत गूंजने लगा।
हर पेड़ ओर पंछी चहके
हर जगह पर थी गूंजन
तब मैं सजी संवरी
लगती थी मानो दुल्हन
देख गहनों से लदी मुझे
लोगों ने फि र ये कहा
देखों वहां पर बैठी है
वो है सोने की चिडिय़ा
मुझे लूटने के लिए फि र
तुर्की, डच, फ्रांसिसी
और तुर्क का सहजादा
ले बहुत ही भारी सैना
लूट ले गया मुझे और
रौंदा मुझको अच्छी तरह
छोडक़र मुझको घायल तडफ़ ता
मौज मनाता चला गया।
अब भी थोड़ी जो संभली
तो फि र आए ब्रिटेन के पूत
उन्होनें तो हद ही कर दी
चढ़ गए मेरी छाती पर वे
और लगाने लगे वो कूद
लूटा खूब उन्होनें मुझे
रौंदी छाती, मैं रूंदती गई
रोती चिल्लाती मैं बिलखती रही
मासूम आँखों से मैं
दिन-रात अश्रु बहाती रही
तीन सौ साल अपनी छाती पर
मूँग उनके हाथों दलाती रही।
आँखों के अश्रु देख फि र
जागे हठीले पूत मेरे
पूतों ने दिया तोड़ थोबड़ा
आबरू लूटने वालों का
भारत छोडऩे पर मजबूर हुए
ये हाल किया उन सालों का
तोड़ दी मेरी जंजीरें
फि र से चमन खिलने लगे
आज बहुत ही थी खुश मैं
माना सारी लूट कर भी
मेरी रूकती लौटा दी सांसे
ये थे मेरे पुत्र प्यारे
ये थे मेरे वीर बांकुरे
मैं इनकी जननी माता
ये थे मेरे नन्हें प्यारे
आज इन्होंने अदा किया
मुझ पर जन्म पाने का
और मेरे आंचल में
खून पसीना बहाकर
वो सारा जीवन ही इन्होनें
मुझ भूमि पर वार दिया।

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