अपनेपन का एहसास

अपनेपन का एहसास

न जाने क्यों इस भूमि में
एहसास है अपनेपन का ।
कि तनी दूर मैं घुम लिया हूं
लगता है सबकुछ अपना सा ।
वही है धरती वही हरियाली
वहीं हैं लोग वही खुशहाली
गाते हैं राग-फाग लोग यहां के
आता है जब सावन मस्ताना ।
न जाने क्यों इस भूमि में
एहसास है अपनेपन का ।
मां के जैसी मुझे है प्यारी
वसुन्धरा की हरी हरियाली
थकान मिटाता गोद में सर रख
होता हूं जब थका-थका-सा ।
न जाने क्यों इस भूमि में
एहसास है अपनेपन का ।

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