₹…इंसान की कीमत…₹

एक दिन मैँ जा रहा था सडक पे,
सडक पे पडा था जनाजा किसी का,
जिसे घूर रहे थे कुत्ते वहीँ पे,
जाने वो बदनसीब था कौन सा,
जिसे मरना भी था तो सडक पे ।

उसे मैँ क्या कहूँ, कहूँ भिखारी
या फिर कहूँ राहगीर,
मगर था तो वो इंसान ही ।
मेरे अंदर भी इंसानियत जागी और
मैँने उठा लिया था पत्थर वहीँ पे ।

लगा निशाना कुत्तोँ को चाहा मारना,
मगर एक ने रोक दिया कहा –
भई ये दुनिया है जालिमोँ की,
कहीँ पुलिस केस ना हो जाए
सो चुपचाप निकल लो यहाँ से ।

इंसानियत मर गई मेरी अब तो,
खुद को कोसता रहा मैँ अपनी बेबसी पे ।
फिर जब मैँ जाने को हुआ ।
तभी आ रही थी एक मंडली कहीँ से ।
पता चला मंडली मेँ थी एक नेता की अर्थी ।
जो जा रही थी अंतिम संस्कार मेँ ।

क्या फूल लगे थे उसकी अर्थी मेँ ।
शमा रोशन हुआ जा रहा था गुलजार मेँ ।
तब मुझे हुआ ये एहसास
की ये दुनिया है दीन दुखियारोँ की ,
लेकिन है तो शौक से भरे पाखंडी मस्तानोँ की ।।

4 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 05/05/2016
  2. C.M. Sharma babucm 05/05/2016
  3. ctirkey 05/05/2016
  4. ctirkey 05/05/2016

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