अस्थेश्वर

भीड़ से चीखकर ये आवाज़ आई
तोड़ो ये दिवार जो सच पर छाई
परम सच है इस दिवार के पीछे
अरसे पहले ये महापुरष कह गए
श्री श्री 117 हो के गुजर गए
सभी लग गए इस जुगाड़ मे
तोड़ दिवार पा लो सच रात की आड़ मे
सूरत भी अब चाँद से जा मिला था
पर मज़ाल एक पत्तर भी हिला था
एक बच्चे ने कहा लो सब एक कील हथ मे
बनाओ एक सुराख़ सब साथ मे
सच देखने को तो झरोखा ही काफी है
दूरिया मिलो की बस एक लौ ने नापी है
अब हो चला सुराख़ गहरा था
हौसलों से भरा सबका चेहरा था
हो गया अब सत्य का ज्ञान था
वहां ऋषियों की अस्थियो का थान था
सत्य जीवन नहीं मृत्यु परम था
पर लोगो को समझ ना आया
एक बार फिर खुद को भरमाया
तभी तो आज वहां अस्थेश्वर बनाया !!!

4 Comments

  1. dev 04/05/2016
  2. babucm babucm 05/05/2016
  3. GauravSharma11 GauravSharma11 05/05/2016
  4. Praveen 05/05/2016

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