कलयुग की महिमा………………..

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

कर्म करो तुम या मत करो
चापलूसी पर बस नजर धरो
बिन मेहनत फल मिलता है
मालिक का बरसता प्यार है

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

ईमानदारी की मत गई है मारी
सच्चाई पर झूठ पड़ता है भारी
रिश्वत खोरी चरम सीमा पर है
जिधर भी देखो मची लूटमार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

जिस के पास जितना अधिक धन है
वो उतना ही महान गुणी जन है
निर्धन यंहा अधर्मी अपवित्र बेकार है
दुनिया से मिलती उसको दुत्कार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

चोरी का माल खूब फलता है
सत्यवादी देख देख जलता है
बेईमानी बना आज परोपकार है
लूट खसोट की चलती सरकार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

बाज़ार में कीमत सुन्दर तन की
कालिख लगती है सुथरे मन की
व्यभिचार का बढ़ता आज ग्राफ है
फलता फूलता खूब आज अत्याचार है

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

जो जिंतना चालाक और स्वार्थी
वो इस युग का विद्वान विद्यार्थी
सरल स्वभाव को पागल की संज्ञा
देकर पीछे पड़ा उसके पूर्ण संसार है

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

दिन रात जो कुकृत्य फैलाते
गंगा नहाकर पवित्र कहलाते
अंतरात्मा से उनके मन है काले
प्रभु का उन पर हुआ बड़ा उपकार है

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

पेट भरना ही नहीं परम लक्ष्य है
मुद्रा कोष के लिए बने सब भ्रष्ट है
सत्ता हासिल करना परम अधिकार है
साम, दाम, दण्ड भेद बने हथियार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

कही पे सूखा, कही अकाल
कही पे पानी, कही तूफ़ान
झेल रहे है प्रकृति की मार है
फिर भी नहीं ढलता अहम का खुमार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

हर कदम पर मतलबी फरेबी मिलते है
कई लोग माया के झंडे गाड़े मिलते है
ऊचाईयाँ छूने को मुंह के बल गिरते है
आदमी ही आदमी का करता है शिकार है !

कलयुग की महिमा अपरम्पार है, देवो पर भारी पड़ता शैतान है
कर्म से ज्यादा चापलूसी फलती, दान- धर्म भी बना व्यापार है !!

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डी. के. निवातियाँ ___________@

18 Comments

  1. Kajalsoni 05/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  2. योगेश कुमार 'पवित्रम' योगेश कुमार 'पवित्रम' 05/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  4. anuj tiwari 05/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  5. sarvajit singh sarvajit singh 05/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  6. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 06/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  7. C.M. Sharma babucm 06/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 06/05/2016
  8. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 07/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/05/2016
  9. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 07/05/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/05/2016

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