साईकिल बनाम मोटर-साईकिल

साईकिल और मोटर-साईकिल का अहं
एक दिन आपस में टकरा गया।
एक दूसरे को निचा दिखाने वास्ते,
दोंनों ने तर्कों का सहारा लिया।
मोटर-साईकिल गुर्रा कर बोला
साईकिल तुम अपनी औकात में रह।
मेरी खुद की जितनी कीमत है
उतने में तेरे जैसे मिलेंगे दस पंद्रह।।
अगर गलती से भी टकरा गया मै,
तो तुम चकनाचूर हो जाओगे।
चाहे कितना जोर लगा लो,
मेरी बराबरी न कर पाओगे।
कही दूर तुरंत जाने की जल्दी हो
तो तेरा होश फाख्ता हो जायेगा।
कच्छप चाल है तेरी, हिम्मत करके भी
तू कभी मंजिल नहीं पहुँच पायेगा।।
देख मुझे तू, एक किक मरते ही
पवन से बाते करता हूँ।।
पल पल की कीमत पहचानू मै,
पल भर भी देर न करता हूँ।
बड़े बूढ़े शौक से बैठते मुझपर
युवाओ की शान हूँ मै।।
आजकल के लडको से पूछ
सबके दिलो का अरमान हूँ मै ।
इतना सुनकर साईकिल भी
जोर से चिल्लाया-खामोश!!
सबकी कीमत पैसे से तौलने वाले
पहले ठीक कर अपना होश।।
माना मै कम पैसे में आता हूँ पर
बिन मेरे भी काम नहीं चलता है।।
बच्चा किसी को हो, सर्वप्रथम
मुझे ही पाने की जिद करता है।।
मेरी सवारी जो नित्य करता,
अपने को निरोगी पाता है।।
गरीबों की तो जीवन रेखा मै,
मुझसे ही गरीब कमाता है।
तेरे पवन वेग का क्या कहना,
उसने कितनो का घर उजाड़ा है।
माताओ के अरमान बहें है,
युवाओ का किया कबाड़ा है।
तुम क्या बोलोगे, तेरी आत्मा बंद है
ईरान, इराक, कुवैत के कुपों में।
बनावटी जीवन के आधार तुम
गाढ़ी कमाई चूसते हो कई रूपों में।।
मानवीय अविष्कारों के होड़ में
कौन जाने कब तक अपनी सत्ता है।
जो भी है यहाँ, काल खंड के हिसाब से,
सबकी अपनी विशिष्ठ महत्ता है।।

✍सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”✍

5 Comments

  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/05/2016
  2. babucm babucm 04/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 04/05/2016