गरीब बच्चे की व्यथा

मौसम था जेठ
और गर्मी थी खूब ऐंठ
बाबा बनाते थे बेंत
और माँ जाती थी कमाने
पास के खेेत
फिर भी
खाली थी प्लेट
और खाली था पेट

जी तो बहुत चाहता था
स्कूल के बच्चों को देख
काश मैं भी पढता साथ
उनके क्लास में बैठ
उम्र भी तो थी मेरी
सिर्फ eight
मगर मुझे भेज दिया
करने मजूरी यहाँ उनके
जो कहलाता था
शहर का नामी सेठ
फिर भी
खाली थी प्लेट
और खाली था पेट

एक दिन सेठ ने
निकाल दिया
काम से अपने
कान को मेरे ऐंठ
कहा चोर उच्चक्का मुझे
और लाथ मारी मेरे पेट
और पटक दिया मुझे
बाहर अपने गेट
वहां से उठा
फिर रोते गया मैं
पास के खेेत
वहां पड़ा था
खाना किसी का
जिसे चाट रही थी
एक कैट
पास गया तो देखा
खाली थी प्लेट
और मैं फिर रह गया
खाली पेट

ना देखा
कभी कुतुबमीनार
ना देखा
कभी इंडिया गेट
देखा है तो मैंने सिर्फ
लहलहाते खेत
ना तो कभी जाना मैंने
कैट, मैट और
ना ही जैट
मैंने तो सिर्फ जाना है
गरीबों का रेट
आज चाहे देश
कितना भी क्यों ना
चढ़ जाए तरक्की
पर बैठ
मगर हमेशा दबा रहेगा
गरीबों के वेट
आज भी मैं भूखा हूँ,
प्यासा हूँ, तड़पा हूँ
और दर – दर की
ठोकरें खाते
घूम रहा हूँ
लेकर खाली प्लेट
और हमेशा की तरह
आज भी खाली है
मेरा पेट !!

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 04/05/2016
  2. ctirkey 04/05/2016

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