“नेह के धागे”

चाँदनी में भीगे चाँद ने
खुले आसमान से
शीतल बयार के संग
कानों में सरगोशी की
आँखें खुली तो देखा
भोर का तारा
छिटपुट तारों के संग
आसमान से झांक रहा था
कुछ नेह के धागे थे
जो खुली पलकों की चिलमन पे
यादों की झालर बन अटके थे
चाँद की ओट में चाँद के साथ
कितनी ही बातें थी
कुछ आपबीती कुछ जगबीती
अरुणिम अरुणोदय के साथ ही
ख्वाबों की तन्द्रा बिखर गई
यादों की गठरी में सिमट गई
सब बातें कही या अनकही ।

“मीना भारद्वाज”

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/05/2016
    • Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 03/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 03/05/2016
    • Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 03/05/2016
  3. babucm babucm 03/05/2016
  4. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 03/05/2016

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