“ये रिश्ता क्या कहलाता ह?”

भ्रष्ट, धूर्त नेताओं पर कटाक्ष करती मेरी ताजा रचना ——
(अवश्य पढ़े)
रचनाकार–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
whatsapp- 9675426080

“ये रिश्ता क्या कहलाता है”

सब तीरंदाज बने हैं सबका कंधा एक कपूत हुआ
आतंकी पहरोकारों के पैरों की धूल, भभूत हुआ

सबकी आँखो का तारा है जो बर्बादी का दूत हुआ
पर बात एकता की करता जो सबको आज अछूत हुआ

अब तक क्या भारत माँ थी सुख चैंनों से सत्तर सालों में ?
अब तक क्यों नहीँ दिखा किसको भी दर्द झलकता छालों में ?

अब तक भुखमरी गरीबी से क्या आजादी थी भारत को?
वो कोहिनूर जो दे आजादी आज मिला है भारत को

पर सोचा ना था राजनीति इस हद तक भी गिर जाएगी
सत्ता की कुर्सी देशद्रोहियों से जाकर मिल जाएगी

बन आज दुशासन सब भारत माँ की अस्मत को लूट रहे
कितना दे चीर नंद-लाला सब बनकर कूकुर टूट रहे

आओ तुमको मैं इन सब दल्लों की औकात दिखाता हूँ
इस कलियुग के कान्हा रूपी कंसों की जात बताता हूँ

ममता की ममता धूमिल है, माटी, मानुष से प्यार नहीँ
घायल बंगाल बोस का है, दिखता है अत्याचार नहीँ

चारे को चबा-चबा खाने वाले चौपे भी बोल उठे
सब चोर, चोर को ईमानों वाली नज़रों से तोल उठे

जो बना प्रतीक कुशासन का जो जंगलराज का दाता है
उसको भी उद्घोषक बर्बादी का कितना ही भाता है

चोपर की चटनी चाट-चाट के कितने लोग चटोर हुए
कितने ही ढेर लगा घोटालों के सारे ही चोर हुए

वो चोर आज बेईमानी पर ज्ञान बाँटने निकले हैं
इक नीच नपुंसक की देखो तशरीफ़ चाटने निकले हैं

दिल्ली का डमरूबाज भी देखो कैसा ढोंग रचाता है
बाज़ार झूट का बेंच कपूतो को नादान बताता है

ये भूल हिदायत न्यायालय की और भूलकर झाड़ों को
ये उष्ट्र चुनैती हरदम ही देता रहता है पहाडों को

अब शिव सैनिक भी असुरों के जत्थे में शामिल हो बैठे
दर्पण को दोषी बोल रहे कीचड़ से चेहरा धो बैठे

कल तक जो हिन्द सनातन के हमको घातक हथियार लगे
वो सिंह ठाकरे के वंशज भी हमको आज सियार लगे

उस सीताराम के प्यादे में सबको भवतारण दिखता है
उन बर्बादी के नारों में भी छंद मन्हारण दिखता है

जबसे कस गये पेंच सारे जबसे देखा है टोटे को
ख़बरंडी ने भी तो तबसे पीछे छोड़ा है कोठे को

जो कलतक रहे धुरविरोधी वो आज एक हो बैठे हैं
सबकी नज़रों में जेहादी सरताज नेक हो बैठे हैं

सबने ही गोद बिठाया है नापाकी दुष्ट कन्हैया को
जैसे वो लट्ठ लगाएगा इन सबकी डूबी नैया को

बस एक निशाना ही सबका, आतंक सभी को भाता है
ये “आग” पूँछता है दल्लो “ये रिश्ता क्या कहलाता है ”

———–कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”

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