“प्यास बुझाने अब वो समंदर नही आते”

प्यास बुझाने अब वो समंदर नही आते ।
आते है वो दरवाजे तक अंदर नही आते ।
जख्म पे नमक भी सुकून देता था तब ,
अब मरहम लगाने वो सीतम्गर नही आते ।
टूटी हुई कश्ती मे भी हौसला कितना है देखो ,
जो इसको डूबा सके ऐसे भवन्डर नही आते ।
मंजिलें मिल चुकी हो तो थोड़ी कदर भी करलो ,
वरना खुद चल के कभी मुकद्दर नही आते ।
दौर अपना है तो राज भी अपना होना चहिये ,
हर बार दुनिया जितने वो सिकन्दर नही आते ।

-एझाझ अहमद

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 03/05/2016
  2. anuj tiwari 03/05/2016
  3. babucm babucm 03/05/2016