डायन

मै ममता की भूखी थी
दुनिया ने डायन बना दिया।
उड़ेल टीन किरोसिन का
पल में मुझको जला दिया।।
अग्नि की घोर तपिश बीच
फड़फडाती मै बेहद लाचार।
बेरहमों के कोहराम में दब
रही थी मेरी चीख पुकार।।
कसूर मेरा इतना दस सालों
में माँ नहीं बन पाई थी।
नारीत्व सुख की अनुभूति
केवल सपनों में आई थी।।
किसी मासूम को देख मन
होता था गले लगाने को।
तरस रही थी ममता मेरी
अतृप्त प्यास बुझाने को।।
दर दर भटक रही थी मै
बस एक बच्चे की चाह में।
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गयी
गयी थी पीर दरगाह में।।
टोटको का लिया सहारा
बस अपनी गोद भरने को।
भावना किंचित न थी कभी
कोई घर उजाड़ने को।।
मेरे टोटकों को दुनिया ने
अपनी नजरिये से देखा।
पलभर में निगाहे फेर ली
हो गयी मै डायन सरीखा।।
अब तो हर दुखद घटना की
बस मै ही थी जिम्मेदार।
कौन सुनता मेरी, सबको
डायन का था धून सवार।।
कल तक तो सब अपने थे
सबके लिए जगती थी।
चाची, भाभी, मामी, बस
यही तो सबकी लगती है।।
छठी बरही का सोहर हो
या शादी का नारी संगीत।
गाती थी, थिरकती थी मै,
जोडकर मानवीय प्रीत।।
कल भी मैंने ममता बस
नन्हे को गोद उठाई थी।
पागलो की तरह चूमी थी
अपना प्यार लुटाई थी।।
पता नहीं कब बुखार आया
कर ली उसने बंद आँखे।
मुझे सुनाई दे रही थी बस
डायन डायन की आवाजे।।
मै किंकर्तव्य-विमूढ़ सी खड़ी
भीड़ को देख रही थी।
परबस उनसे जिनकी
आत्माये कब की मर चुकी थी।।
ली गयी नारीत्व परीक्षा मेरी
डाल हाथ खौलते तेल में।
क्या हिम्मत है किसी की
खुद को तौले इस खेल में।।
काश सीता कर दी होती
अग्नि परीक्षा से इंकार।
तो नारीओं को नहीं देनी
होती यूँ परीक्षा बारबार।।
मेरी ममता पाक थी, तुम
अपने को कब सांफ करेगा।
मै तो अब राख हूँ, राख
का क्या कोई इंसाफ करेगा।।
✍सुरेन्द्र नाथ सिंह” कुशक्षत्रप”✍

8 Comments

  1. babucm babucm 02/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/05/2016
      • babucm babucm 02/05/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/05/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/05/2016
      • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/05/2016