“मजबूर हूँ मैं यारों”

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“मजबूर हूँ मैं यारों”

तड़पती दोपहर में ,
झुझता-झूमता रहता हूँ ,
कब शाम ढले ये शमा ,
बस यही सोचता रहता हूँ ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !
जब चिड़ियाँ चहचहाती है ,
मैं शो नही पता हूँ ,
जब लाली छाती है ,
मै छोड़ घर चला जाता हूँ ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !
जब सर पे सूर्य मंडराता है ,
मेरा वक्त बदल जाता है ,
गाड़ी-घोड़ा वाले आते है ,
मुझे देख चले जाते है ,
मैं दिखा नही उनको तो ,
पैसे भी मार जाते है ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !
मै जानता नही हूँ ,
मेरा कर्म-धर्म क्या है ,
मैं सोचता नही हूँ ,
मेरा तन-मन का समर्पण क्या है ,
बस लगा उसी में रहता हूँ ,
जो लोग मुझे बताते है ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !
एक दिन मेरा भी आता है ,
कुत्तें का भी दुनियां बदल जाता है ,
लोग मेरे पास आते है ,
दारू-पैसा देकर जाते है ,
समझ नही पाता हूँ मैं ,
ये किउ मुझ पे इतना इतराते है ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !
लोकतंत्र के झासा देकर ,
पासा बदलने आते है ,
देश की बुनियादी ढाचों पे ,
भाषण अपना सुनाते है ,
कुछ काम नहीं है इनका ,
बस काला बाज़ारी से जाने जाते है ,
मजबूर हूँ मैं यारों ,
मजदुर कहा जाता हूँ !

लेखक: कवी निशांत भारद्वाज राजपूत,
राजनीतिकशास्त्र एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध ,
पांडिचेरी विश्वविद्यालय
MOB: 7598121941

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/05/2016

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