१५. जानेमन मेरी कहाँ गयी ……………….| गीत | “मनोज कुमार”

रब मेरे मुझको बतला जानेमन मेरी कहाँ गयी
पहले रूठी झगड़ी थी वो बात पुरानी हो गयी
सूझ अब कुछ ना रहा वो दूर कैसे हो गयी
पहले लड़ती थी कभी वो बात पुरानी हो गयी

गली मोहल्ले पार्क अपने भी वीराने हो गये
फूलों के आँगन से वो बहारें लेके सिमट गयी
कितना मैं इसको समझाऊँ रूह दीवानी हो गयी
आईना देखा तो जब मुस्कान हमारी मुकर गयी

रब मेरे मुझको बतला जानेमन मेरी कहाँ गयी
पहले रूठी झगड़ी थी वो बात पुरानी हो गयी
सूझ अब कुछ ना रहा वो दूर कैसे हो गयी
पहले लड़ती थी कभी वो बात पुरानी हो गयी

सावन में हो जैसे सूखा दिल पतझड़ सा कर गयी
बेगाना करके दिलबर को दिल की रानी चली गयी
छोड़ गयी वो शहर अकेला कूच कहाँ वो कर गयी
दिल जब तक समझ पाता बिन समझायें चली गयी

रब मेरे मुझको बतला जानेमन मेरी कहाँ गयी
पहले रूठी झगड़ी थी वो बात पुरानी हो गयी
सूझ अब कुछ ना रहा वो दूर कैसे हो गयी
पहले लड़ती थी कभी वो बात पुरानी हो गयी

रूत बदले मौसम बदले वो भी ऐसे बदल गयी
गैरों के हमें छोड़ हवाले तन्हा तन्हा कर गयी
होगी कुछ मज़बूरी दिल ना बेवफ़ा वो थी कभी
मीरा जैसी थी दीवानी अमर प्रेम वो कर गयी

रब मेरे मुझको बतला जानेमन मेरी कहाँ गयी
पहले रूठी झगड़ी थी वो बात पुरानी हो गयी
सूझ अब कुछ ना रहा वो दूर कैसे हो गयी
पहले लड़ती थी कभी वो बात पुरानी हो गयी

“मनोज कुमार”

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/05/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 01/05/2016

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