जीवन का यथार्थ

?✍जीवन का यथार्थ✍?
गुलिस्ता को रंग बदलते देख,
बात समझ में आ गयी।।
चार दिन की जिन्दगी है,
जी ले तू जी भर के।।।
महक रहा था उपवन जो,
पुष्पदल के खिलने से।
भौरे गुन गुन करते थे,
पराग रस भर मिलने से।।
पंछी बसेरा करते थे,
जिसकी हरी भरी डाली पर
पथिक भी छाया लेता था,
खुस होता था माली पर।।
उस उपवन में पतझड़ देख,
बात समझ में आ गयी।।
चार दिन की जिन्दगी है,
जी ले तू जी भर के।।।
वर्षा ऋतु आने पर जो नदी,
बहती थी उफान से।
आगोश में समां लेती सबको,
टकराती थी चट्टान से।
पर्वत बौना बन जाता,
जब धरती रूप विकराल।
किसकी मजाल की राह रोके,
ठोकती थी वह ताल।।
उस नदी को वीरान देख,
बात समझ में आ गयी।।
चार दिन की जिन्दगी है,
जी ले तू जी भर के।।।
घने जगलों के झाड़ झुरमुट,
कुछ ऊचे कुछ नीचे।
शाल पलास महुआ शीशम
सभी आँख मिचे।।
हस्ती नहीं किसी की, जो
जड़ जमा पाए इनमे।
रौशनी की विसात क्या,
धस न पाती हवा जिसमे।।
उसमे दावानल की दहक देख,
बात समझ में आ गयी।।
चार दिन की जिन्दगी है,
जी ले तू जी भर के।।।
महलों के शान शौकत को
कहने वाले बहुतेरे।
प्रतिदिन नौबत बजती थी,
जहा संध्या और सबेरे।।
बांध खड्ग तलवार, आठ
घोडों पर सजती थी सवारी।
रुक जाता था पथिक,
दर्शन को प्रजा उमड़ती सारी।।
उन महलों के खण्डहरों को देख,
बात समझ में आ गयी।।
चार दिन की जिन्दगी है,
जी ले तू जी भर के।।।

✍सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”✍

10 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 30/04/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/04/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 30/04/2016
  3. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 01/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/05/2016
  4. Archana mehta 01/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 01/05/2016
  5. C.M. Sharma babucm 02/05/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 02/05/2016

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