कायाकल्प

फिर क्या हो जाता है

कि क्लास-रूम बन जाता है काफ़ी-हाउस

घर मछली बाज़ार?
कोई नहीं सुनता किसी की

मगर खुश-खुश

फेंकते रहते हैं मुस्कानें

चुप्पी पर,

या फिर जड़ देते नग़ीने !
करिश्मे अजीबोग़रीब –

और किसी का हाथ नज़र भी नहीं आता –

पहलू बदलते ही

जार्ज पंचम हो जाते हैं जवाहर लाल !

Leave a Reply