**** एहसास ******

कुछ एहसास हैं जो वक्त की स्याही में डूबे हुए है
कभी अलफ़ाज़ बनकर कागज के टुकड़ो पर उतर आते हैं
तो कभी आँखों के किनारों पर बैठकर आराम करते हैं

तुम्हारी यादें भी अजब है सच्ची
कभी भाप बनकर इन आँखों के समुन्दर से उड़ जाती है
तो कभी बारिश के साथ फिर इस मिटटी के बदन में मिल जाती है
शायद अहसासों को ज़िंदा बनाए रखने के लिए जरुरी भी है
अच्छा ही तो है

बिना यादो की बारिश के
अल्फाज़ो में नमी नहीं होती
या यूँ कह लो एक खेत में बिना इसके फसल हो भी कैसे सकती है
फसल शब्दों की हो या गेहूं के दानो की
बिना पानी के सूख कर मर ही जाती है

खैर अब तो मौसम भी वेवक्त हो चला है
रात को करवटो में उलझाए रखता है
डर लगता है इस बार कहीं बारिश ज्यादा न हो जाए

ये एक और अहसास है जो न जाने क्यों मेरे पीछे पड़ा है
मेरे अल्फाज़ो का हिसाब मांगता है पर उन गेहूं के दानो का मोल नहीं लेता
जो बाजार में बिक जाते है सस्ते दामों पर

चलो बिकते तो सही है वो दाने किसी के आँगन में पहुँचने को
मेरे कलम के हर्फ़ तो वहीँ टूट कर बिखर जाते अपनी बालियों से
पर सच कहूं न जाने कौन सा राज छुपा है उनमे
कि बिखरते तो वो बेशक है
पर एक नयी फसल तैयार करने को
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7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/04/2016
    • shishu shishu 29/04/2016
  2. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 29/04/2016
  3. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 29/04/2016
    • shishu shishu 29/04/2016
  4. babucm babucm 29/04/2016
    • shishu shishu 29/04/2016

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