तुम्हारा शौंदर्य

तुम्हारा शौंदर्य

तेरी आँखें
तेरा चेहरा
उतर गया
सीने अंदर
तोड कर
सारा पहरा
चेहरे पर
मद भरी
नशीली आँखें
नुकीली नाक
लाल कमल
पंखुरी से होंठ
शरारती हवा
बार-बार
टकरा कर
छेडती तेरी
जुल्फों को
काली लट भी
इधर-उधर
लहरा कर
बिखरती हुई
चेहरे पर
और सुन्दरता
बढा देती है
गोरे चेहरे को
और गोरा
बना देती है।
पूरा शरीर
ढला हुआ
किसी तरासी
मूर्ति -सा
हर जगह
अलग-अलग
हर अंग
अपनी जगह
शोभायमान
हो रहा
हाथों का
अपनी जगह
अपना अलग
महत्व है
टांगे भी
खिली-खिली
हरे कपडों
से ढकी
अपना महत्व
जता रही हैं
आगे पिछे
बढ कर ये
उन्हें ओर
लहरा रही हैं
वाकई तुम
क्या हो
क्या इन्द्र की
हूर हो
या फि र
आसमां से
उतरी हुई
तुम कोई
परी हो।

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 29/04/2016
  2. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 29/04/2016

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