ग़ज़ल।जरूरत ही नही समझा।

ग़ज़ल ज़रूरत ही नही समझा ।

रदीफ़-ही नही समझा ।
काफ़िया-हक़ीक़त,मुहब्बत,अशिलियत आदि
मतला-
ग़मो के दर्द तन्हा को हक़ीक़त ही नही समझा ।
हमारे प्यार को तुमने मुहब्बत ही नही समझा ।।
शेर-
तुम्ही ने तो दिखाया था मुझे साहिल पे जख़्मी दिल।
बढ़ाया हाथ खुद तुमने अशिलियत ही नही समझा ।।

दिखाया राह गर्दिश में लुटाकर जिंदगी बेशक़ ।
बेदागी रहनुमाई की नज़ाक़त ही नही समझा ।।

इन्ही आहो से आँशू से लगाया दिल पे था मरहम ।
वफ़ा कैसे करोंगे जब नसीहत ही नही समझा ।।

सज़ा मिल के ही रहती है यक़ीनन ही गुनाहो की ।
लुटा दी ज़िंदगी सारी मुरौव्वत ही नही समझा ।।

छुपाएँ कब तलक हमदम तलाके इश्क़ के आँशू ।
तुम्हारी बेवफ़ाई को सरारत ही नही समझा ।।

मकता-
तपिश का दर्द रकमिश’खुद निग़ाहों से ज़रा पूछो ।
कि तुमने आज तक मेरी जरूरत ही नही समझा ।।

© राम केश मिश्र(रकमिश)

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 29/04/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/04/2016
  3. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 29/04/2016

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