धरती के लाल

अब के बरस क्या होगा, जो बरसा ना पानी,
गाओं में बचेंगे सिर्फ बूढ़े, न बचेगी जवानी,
उगलेगी सोना धरती, की वो कहानी पुरानी,
सुनाती थी अक्सर, सबको वो बूढ़ी नानी ,
हंसती है सुन कर मुन्नी, हो चुकी अब सायानी ,
ऋण में डूबी किसानों की , ज़िंदगी की कहानी ,
आत्महत्या पर होती खत्म है, जिनकी ज़िंदगानी ,
सदियों से जो होता रहा है, उसमे कमी कहाँ है आनी ,
गरीबी में जैसे जीने मरने की , इन लाचारों ने है ठानी,
सिर्फ खेती न सम्भाल पाएगी, किसानो की आमदनी ,
प्रगति शहरों की गाओं गाओं तक, होगी पहुंचानी,
तभी जा कर दूर होगी , हर गाओं की परेशानी,
धरती के लालों को भी होगी, अब इज़्ज़त दिलवानी ,
फले फूले परिवार उसका ,हो प्रकृति की भी मेहरबानी
लिखते हुए न जाने क्यों आ गया, मेरी आँखों में पानी ।

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 28/04/2016
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/04/2016

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