बैठे रहे हम रूठ कर – सर्वजीत सिंह

बैठे रहे हम रूठ कर

वो अपने घर, मैँ अपने घर, बैठे रहे हम रूठ कर
ऐसा लगता था की वो खुद आये या आये कोई उसकी खबर
वो अपने घर, मैँ अपने घर, बैठे रहे हम रूठ कर

ज़रा सी आहट होती थी तो लगता था कोई पैग़ाम आया
बहुत चाहने पर भी मैँ उसको कोई सन्देशा भेज ना पाया
फिर भी ना जाने क्यूँ ये दिल बार-बार होता है बेसबर
वो अपने घर, मैँ अपने घर, बैठे रहे हम रूठ कर

सोचा था शायद वो मेरे प्यार की तड़प को जान ले
अपने दिल में बसे हुए मेरे प्यार को पहचान ले
सब कुछ जान कर भी ना जाने क्यूँ है वो बेखबर
वो अपने घर, मैँ अपने घर, बैठे रहे हम रूठ कर

कई बार कोशिश की मैंने मनाने की पर ना मानी वो
प्यार के वादों से, रस्मों से, कसमों से है अन्जानी वो
प्यार की ये दीवानगी कि कटे अब इन्तज़ार में सारी उम्र
वो अपने घर, मैँ अपने घर, बैठे रहे हम रूठ कर

प्यार भरी मेरी बातों पर जब गौर किया उसने
लौट आये उसकी आँखों में प्यार के सभी सपने
कसम खाई हम दोनों ने जुदा ना होंगे अब ज़िंदगी भर
ना रूठेंगे ना रूठने देंगे अपना होगा एक ही घर
मोहब्बत से भरा होगा ये तेरा घर ये मेरा घर
कभी बैठेंगे ना हम रूठ कर

लेखक : सर्वजीत सिंह
sarvajitg@gmail.com

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 29/04/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 29/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/04/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 29/04/2016
  3. C.M. Sharma babucm 30/04/2016
    • sarvajit singh sarvajit singh 30/04/2016

Leave a Reply