नादान परिंद भोग रहे फल इंसानी करतूतों के

महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों में सूखे की चपेट पर सभी से पानी बचाने की अपील करती मेरी ताजा रचना,
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रचनाकार- कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग”
whatsapp- 9675426080

पपिया की प्यास ना बुझ पाई
स्वर गुम हैं कोयल गीतों के
नादान परिंदे भोग रहे फल
इंसानी करतूतों के
चूं-चूं गौरैया की खो गयी
चहचाहट तोते की गुम है
सो गयी मोर की प्याओ-प्याओ
गुट्टर गूँ भी तो गुमसुम है
छुप गयी चौकडी भी मृग की
शावक की कहीँ दहाड़ नहीँ
वानर की नटखटिया गुम है
हाथी की भी चिंहाड़ नहीँ
नदियाँ पोखर झरने सूखे
और सूखे घाट तलाबों के
हरियाले वृक्ष भी ठूँठ हुए
और सूखे बाग गुलाबो के
यूँ लगे समंदर भी प्यासा
तपते मौसम की गर्मी में
लगता है मेघ भी हैं क्रोधित
ना कोई चाहत नरमी में
कुछ कृपा हुई प्रभु की इतनी
पहुँचाया है जल भर-भर के
पर पादप,पंछी और पशू
जी रहे रोज़ ही मर-मर के
इंसानों ने ही छीन लिया
बिनबोलो से हक जीने का
बढ़ रहा है सूखा और कहीं
बर्बाद नीर है पीने का
लाखों लीटर बरबाद नीर
होता है स्वीमिंग पूलो में
फ़िर आग ही तो बरसेगी
अम्बर से सावन के झूलों में
नासमझ बनी है जानबूझकर
नयी खेल की आबादी
किरकिट में और जहाजों पर
होती पानी की बर्बादी
बिक रहा नीर भर बोतल में,
बिक रहा है कोक,पेप्सी में
बिक रहा नशीले द्रव में है
कहीं अँग्रेजी कहीं देसी में
घर-घर में लगे हैं पम्पसेट
बहता पानी फव्वारो से
सब काट दिए हैं वृक्ष द्वार से
धूल उड़े चौबारो से
पर वक़्त हाथ में बाकी है
गलती का आज सुधार करो
रोको पानी की बर्बादी
और वृक्ष लगा उपकार करो
वर्ना फिर याद रहे इतना
कुदरत का एक इशारा ये
लातूर दूर पानी से अब
होगा जहान कल सारा ये

“जल बचाओ जीवन बचाओ”

कवि देवेन्द्र प्रताप सिंह “आग ”
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