“ आज सोचा है हमनें “

सुना है वक्त में भी शायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता ,
ज्व़ा पे इश्क है उनसे ,
नफ़रत नही होता ,
खुदा का क्या इशारा है ,
मुझे मालूम नही ,
सुना है वक्त पे भी शायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता !
समा आज भी उनका ,
किया करता है इन्तिज़ार ,
कल भी था प्यार ,
आज भी है प्यार ,
नशे में कौन कितना है ,
गुरुर किसको पता है आज ,
सुना है वक्त में भी शायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता !

उपवन के शैली-शाखाओं से ,
अब उब चूका हूँ मैं ,
कलि-कलियों की बाधाओं से ,
अब उब चूका हूँ मैं ,
भोरों के अंगारों से ,
अब उब चुका हूँ मैं ,
खोने-पाने की बाधाओं से ,
अब उब चूका हूँ मैं ,
सुना है वक्त में भी सायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता !

याद है ओ दिन ,
बिताये साथ थे हमने ,
दिनों को दिन नही ,
समझे थे रत हमने ,
चंदा की चकोरी से मुलाकात हुई थी ,
एक-दुसरे से काफ़ी बात हुई थी ,
सुना है वक्त में भी शायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता !

नींद आती नही थी अक्सर रातों में ,
घुल-मिल जाते थे मोहबत की बातों में ,
ज़माना कुछ और था आसियाने में ,
फताह भी फिरंगी था अजमाने में ,
सुना है वक्त में भी शायद ,
उन्हें फुर्सत नही होता !

लेखक: कवी निशांत भारद्वाज राजपूत,
राजनीतिकशास्त्र एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध ,
पांडिचेरी विश्वविद्यालय
MOB: 7598121941

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