जीवन का अद्भुत फलसफा

आते, जाते उसी राह से रोज थे,
पर आज कुछ खास देखा।।
बिकते बकरों की आँखों में झाँका तो
उनकी हर साँस उदास देखा।।
चारों तरफ मिमियाती आवाजें,
करुण क्रंदन करती कातर निगाहें।
अद्भुत चमत्कार की आस लगाये,
ख़त्म हो चलीं बचने की राहें।
यह बकरों की मंडी,
यहाँ चंद पैसों पर जिंदगी बिकती है।
कटना ही है बस इनकी किस्मत
पत्थर की लकीर भला कब मिटती है।
बकरे समझ ले, अपने जीवन को
तेरा कोई अब न रहा सगा।।
कातर निगाहों से न देख किसी को
तुझसे न किसी का मोह लगा।।
जिसके आँगन में था तू पला बढ़ा
जिसकी गोद में था कई बार चढ़ा।
प्यार में कभी दुलारा था तुझको
आज वहीँ तुमसे मुंह मोड़ चला।
तेरी नियति शायद बस इतनी
तुझे होना होगा औरों के लिए कुर्बान
तेरी सांसे मेहमान है कुछ पल की
तुझे निवाला बनाने को तत्पर इन्सान।
उम्मीद न कर दया की उस नर से
जिसकी हसरत तेरी बोटी है।
प्यार खाक करेगा जानवर से वह
जिसने अपनों की गर्दन काटी है।
कुशक्षत्रप उवाच
जीवन का मर्म अजब गजब
अगले पल क्या हो किसने जाना।
आज तूने किसी को काटा है
पर नहीं जानते,
किस पल तुझको भी है कट जाना।।

सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

2 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 25/04/2016
  2. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 25/04/2016

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