किसान (गाथा एक गरीब की)

किसान
(गाथा एक गरीब की)
मैँ हूँ किसान
अपनी फसल पर लगा देता जी जान
अन्न मैँ उगाता हूँ
तभी तो अन्नदाता कहलाता हूँ!!

अन्नदाता हूँ पर फिर भी
दो वक्त की रोटी भी नहीं जुटा पाता हूँ
अन्नदाता होकर भी भूखा रह जाता हूँ
मैँ अन्नदाता कहलाता हूँ!!

अपनी फसल पर खूब पसीना बहाता हूँ
करता हूँ पूरी देखभाल
फिर भी काम पैदावार पाता हूँ
मैँ किसा न कहलाता हूँ!!

कड़ी धूप और बारिश में भी
अपना फ़र्ज़ निभाता हूँ
फिर भी दो वक्त की रोटी के लिए
तरस जाता हूँ
तभी तो मैँ आत्महत्या के लिए
विवश हो जाता हूँ
मैँ किसा न कहलाता हूँ!!

आखिर मैँ भी तो हूँ इंसान
मुझमें भी है तो जान
क्यों इतना विवश हो जाता हूँ
की मौत को गले लगाता हूँ
मैँ किसा न कहलाता हूँ!!

पूरे विश्व को भोजन दे
भूखा रह जाता हूँ
इस सब के बदले मौत मैँ पाता हूँ
मैँ किसान कहलाता हूँ
मैँ अन्न का दाता किसा न कहलाता हूँ!!

विक्रम वर्मा “चंचल”

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  1. सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 24/04/2016

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