आपके अनुरोध पर

आपके अनुरोध पर

कभी आप सादगी की मूरत लगती है
कभी स्‍वभाव से खूबसूरत लगती है
मन की सुन्‍दरता लिए लगती है भली
कभी लगती है खिलखिलाती नाजुक कली
मुस्‍कान आपकी कई राज छोडती है
निश्‍छल हंसी से हृदय में तरंग-सी दौडती है
आपने मन की वीणा को झंकृत किया है
जीवन अपना औरों के लिए ही जिया है
आपकी वाणी के भेद को मैं नहीं समझ पाता हूं
जो मिला मुझे आपसे वही तो फिर लौटाता हूं
लगता है कभी आप अपना मन खोलना चाहती है
जो नहीं कहती किसी से ऐसा ही कुछ बोलना चाहती है
एक एकाकी नारी संस्‍कार लिए है
लगता है दुविधाओं का अम्‍बार लिए है
कमियां आपकी अच्‍छे स्‍वभाव से दब जाती है
लगती है आप साधिका जब अपने लिए गाती है
सच यही है आप कहके भी नहीं कहती है
समझ नहीं पाता, आप किन खयालों में रहती है
उदासी का भाव छोडकर बोलो प्‍यार के बोल
हंसी-खुशी से जियो यह जीवन है अनमोल
आपके आने से ही खुशनुमा यह फिजा यह बहार है
आपके अनुरोध पर ही रचा यह शब्‍दों का हार है

-रामगोपाल सांखला ‘गोपी’

2 Comments

  1. Deepak Ajmera 23/04/2016
  2. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 16/10/2017

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