ग़ज़ल- उसकी गली में आना कैसा-शकुंतला तरार

ग़ज़ल—-

उसकी गली में आना कैसा

यूँ मन को बहलाना कैसा ||
यह जीवन है तन्हा तन्हा
सोच सोच घबराना कैसा ||
साजिन्दे सब बैठे हैं पर
देखो है वीराना कैसा ||
दिल पे नश्तर बात-बात में

“ज़ख्मों को सहलाना कैसा” ||
शर्म से पानी-पानी हों तो
थूक से अब नहलाना कैसा||

 

शकुंतला तरार-रायपुर (छत्तीसगढ़)

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 22/04/2016
  2. C.M. Sharma babucm 23/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/04/2016