कलि………….

कलि

कभी किसी कलि को खूबसूरत फूल बनते देखा है
निश दिन रूपांतरित होते स्वरुप को ढलते देखा है
ऐसे ही नहीं आ जाता निखार उसके अंग- अंग में
माघ की सर्दी और ज्येष्ठ की धुप में तपते देखा है !!
!
!!
!!!

डी. के. निवातियाँ ___________@

6 Comments

  1. sarvajit singh sarvajit singh 22/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/04/2016
  2. C.M. Sharma babucm 23/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/04/2016
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 23/04/2016

Leave a Reply