तुम लौट आओ

हर कोई नहीं है तुम जैसा….
मन दर्पण…दिल हो गंगा जैसा….
पंख काट लेंगे…फेंक देंगे सब…
पास अपने..अपने घर लौट आओ…

उगता सूरज संदेसा देता है….
परिधि में उजाला देता है…
रात कितनी भी गहरी काली हो…
घर का दीपक उजाला देता है…

उड़ना लक्ष्य नहीं..है लक्ष्य मंज़िल…
साथ अपनों के खुद उड़ कर देखो..
भ्रम के बादल तो छंट ही जाएंगे….
तारे आँखों के रोशन कर देखो….

तेरी पहचान सिर्फ तुम से है…
क्यूँ उधार की सम्भाल करती हो….
क्यूँ कोई और विषरस घोले…
अपनी आवाज़ के रस बनो खुद ही…

यह मृगतृष्णा है इसको पहचानो….
किस कदर धोखा है छलावा है…
पाओगे प्राण और सुकून अपना तुम…
लौट आओगे पास अपने…घर अपने जब तुम…
लौट आओगे पास अपने…घर अपने जब तुम…
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/सी. एम. शर्मा (बब्बू)

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 21/04/2016
    • C.M. Sharma babucm 21/04/2016

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