माँ की आँखो का इंतेजार थे

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रिय

तुमने कहा तो चल दिए,
कलम तकिये पर छोड़ कर
हमने तो ना कभी कहा
इस जंग को तैयार थे ||

जो मिला कुछ जानदार
साथ उसको ले लिया
घर पर जो छोड़ दिया
वो धारदार हथियार थे ||

किसी की मोहब्बत ने हमे
शायर बना के छोड़ा
वरना तोअब तक आदमी
हम भी ज़रा बेकार थे |

एक बार चढ़े हम मंच पर
दूर-२ तक हमको सुन लिया
वैसे कुछ दिन पहले तक
हम बिन पढ़े अख़बार थे||

ये ना सोचो की हमारी
किसी को परवाह नही
हर शाम दरवाजे पर बैठी
माँ की आँखो का इंतेजार थे||

7 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/04/2016
    • shivdutt 20/04/2016
  2. योगेश कुमार'पवित्रम' 20/04/2016
  3. अरुण अग्रवाल अरुण अग्रवाल 20/04/2016
    • shivdutt 20/04/2016
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2016

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