नहले पर दहला

पति-पत्नी के बीच की नोक झोक
हम सबको गुदगुदाती हैं।
कुसुम प्यार का पल्लवित करती
और सुसुप्त स्नेह जगाती हैं।
मै भी असीमित प्यार का भूखा
मौके की तलाश में रहता हूँ।
पत्नी को तर्क से लज्जित कर पाऊ
इसी ताक में रहता हूँ।
एक दिन मै अकड़ कर बोला,
मेरे नाम के पहले अक्षर ‘स’ से
जिन्दगी की शुरूआत होती है
‘स’ से समय, सूरज, सुबह और
‘स’ से ही शाम होती हैं।
‘स’ से सगाई, ‘स’ से सुहाग और
‘स’ से होता सास ससुर और साली।
‘स’ से सुन्दरता, सत्यता और सफलता,
बिना ‘स’ जग खाली।
पत्नी बड़े प्यार से बोली और
सच क्यों भूल जाते प्राणनाथ।
‘स’ से सूअर, सड़क छाप और सड़ना
और ‘स’ से ही होता सत्यानाश।
मैं बौखलाया, झल्लाया, सोचा
कोई अकाट्य तर्क लाऊंगा।
कुछ भी हो जाये इस बार पत्नी को
कवि वाणी से फसाऊंगा।
झट उनको एक सूक्ति सुनाई
ढोल गवार क्षुद्र पशु नारी।
तुलसीदास के शब्दों में यह
सब है डंडे के अधिकारी।
प्रिये क्या तुम इसका मतलब
भी समझती हो।
या यूँही दिनभर, बिना वजह
मुझ पर गरजती हो।
भार्या मुस्करा कर बोली, संतो ने
समझदारी से यह शब्द कहे हैं
मेरे लिए तो एक,
पर चार मर्दों के लिए गढ़े हैं।

सुरेन्द्र नाथ सिंह “कुशक्षत्रप”

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 20/04/2016
    • सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप सुरेन्द्र नाथ सिंह कुशक्षत्रप 20/04/2016
  2. अरुण अग्रवाल अरुण अग्रवाल 20/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/04/2016
  4. babucm babucm 21/04/2016

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