कसूरबार मैं (इंसान) ही हूँ।

पेड़ों की सूखी टहनियों का,
बेवक़्त मौसमों के इन कहर का
सूखी नदी तालाबों और नहर का
कसूरबार मैं ही हूँ……

रिश्तों में पड़ी खटास का,
अग्रज अनुज की खूनी प्यास का
अकेले में रह रहे माँ बाप का
कसूरबार मैं ही हूँ…..

राजनीति में हो रहे षणयंत्रों का,
अपने हक़ की चढ़ रही बलियों का,
गलत को हमेशा सही कहने का
कसूरबार मैं ही हूँ…..

खुद को ही न समझ पाने का,
पढ़ लिखकर भी अनपढ़ हो जाने का,
सिर्फ खोखली प्रथाओं को अपनाने का
कसूरबार मैं ही हूँ..

देवी माँ को घर घर में पूजने का,
अस्पतालों में पड़ी कोखों का,
कुदरत से कर रहे धोखों का,

कसूरबार में ही हूँ..
सिर्फ कसूरबार में ही हूँ..
कसूरबार में ही हूँ..
कसूरबार में ही हूँ…………
✍ अनुज

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/04/2016
  2. babucm babucm 18/04/2016
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 19/04/2016
  4. Meena Bhardwaj Meena bhardwaj 19/04/2016

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