आह

जब से तुमने थामा हाथ
इस जीवन की राह मे
तब से जाना अच्छे से
सुंदरता है आह मे

तन्हाई प्यार इंकार जुदाई
आज समझ मे आते है
नयन जहां भी दृटि गढ़ाए
देवी आपको ही पाते है

जीने का मकसद ढूंढ लिया
अब तो तुम्हारी चाह मे

सांस निरन्तर क्रिया मे है
कुछ हर क्षण कह जाती है
समय की परी याद तुम्हे कर
भावना मे बह जाती है

मन कहता है चूड़ी बनकर
झूले तुम्हारी बांह मे

स्नेह-भरोसा नष्ट हो रहे
समय के इस दौर मे
महसूस जो तुममे करता हु मे
नहीं किसी भी ओर मे

कुछ भी परीक्षा जीवन ले ले
पग न पीछे जायेंगे अब, जान की परवाह मे

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/04/2016

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