बेरोजगारी

बेरोजगारी है बेकारी
जिससे मेरी माता हारी

बेरोजगारी छाई है समाज के हर छोर
जिससे मानव गिरता है नैतिक पतन की ओर

मेरे देश को ग्रस्त कर गयी
ये भयंकर महामारी

पढ़ लिख कर भी आज बिध्यार्थी
भटकता है इधर उधर
निराशा अक्सर दामन पकडे
चाहे जाओ जिधर

भूख जब लगती है तो
करते है चोरी जारी

सम्मान समाज मे मिले तभी जब
लक्ष्मी का साया हो
कल भी दृढ होता है आपका
आज अगर कमाया हो

दूर दृष्टि के साथ इरादा
यही है समझदारी

कम हो अपने इच्छायों का
प्रभाव रोज मर्रा मे
देश मे अब नहीं रहा अन्न का
अभाव रोज मर्रा मे

सेवा मातृभूमि की करते
उन्नति को रखो जारी

3 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/04/2016
  2. Mahendra 22/12/2016

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