==* दौर *==

अब ना वो दौर रहा हसीं बचपन का
अब फकत आरजुएं जान ले रही है
तब तो लालच था चंद सिक्को का
अब यही लालच पैमाने भर रही है

तब था माँ का आँचल बाप का साया
अब साँसे खुद रूठकर मना रही है
दौर वो भी ख़त्म हो चूका दोस्ती का
अब दोस्ती वो मतलब दिखा रही है

कच्ची केरिया अमरुद की चोरिया
चोरी बदलकर भ्रष्टाचार हो रही है
वक्त ना रहा मासूम इंसानीयत का
लेकर खंजर इंसानियत चल रही है

तब तो थी लढाई खिलोनो के लिये
अब तो लढाई बट्वारे कि हो रही है
तब परसी जाती थी थाली प्यार से
अब हर रिश्तो मे दिवार बंध रही है
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शशिकांत शांडिले, नागपूर
भ्र. ९९७५९९५४५०