हार

अब यही दुनिया की रीत है,
हर रिश्ते से
मिटती लकीर है।
अनुशासन अब कोसो दूर है,
स्वतंत्रता निज गढ़ता
नया रूप है। ।

अब फुर्सत नहीं
किसी के चरणों को
छूने की,
कुछ अपनी कहने की,
कुछ उनकी सुनने की ।

घरें-दिवारे,
रिश्ते – नाते,
सभी सिमट कर हारे हैं,
फिर जाने क्यों
आधुनिकता का राग अलाप,
नित झूठ को ओढ़-ओढ़,
खुद को पल-पल
मारे हैं ।।

अब घर के सभी
मांगलिक कार्यों में,
खामोशी सी होती है,
जहाँ रिश्तेदारो की कमी,
कुछ गिने-चुने मेहमानों से,
पूरी होती है।

आज स्वतंत्रता का बदला अर्थ है,
अपना स्वार्थ छोड़
बाकी सब व्यर्थ है। ।

शुरू कहाँ से
अंत कहाँ,
क्या खोया
और क्या पाया,
यह सब बात
पुरानी है।
अब अनुशासन हारी है,
हर रिश्ते की
नई कहानी है,
जिसमें सिमटी खुशियाँ,
शायद थोड़ी बेमानी है ।।
शायद थोड़ी बेमानी है।

अलका

6 Comments

  1. Jay Kumar 17/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 17/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 17/04/2016
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 18/04/2016

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