अपराध बोध

अतीत का एक बीता लम्हा
सपने में है लौटा,
झूठे प्रेम के,
झूठे रस में,
जिसने मुझको था डूबोया ।

आँख खुली तो
खुद को पाया,
बेहद बेबस,
बेहद तन्हा,
यादों से ढक गया था,
हर एक पल,
हर एक लम्हा ।।

अतीत के एक लम्हें ने,
अच्छा खेल रचा था,
मेरे हीं एक बीते सपने ने,
मेरे रोम-रोम को
अपराध बोध से
ढक दिया था ।

अलका

8 Comments

  1. Jay Kumar 17/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 17/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 17/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 17/04/2016
  3. babucm babucm 18/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 18/04/2016
  4. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 18/04/2016
    • ALKA प्रियंका 'अलका' 18/04/2016

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