ताजा वो एहसास

अजनबी एक मलय समीर थे तुम
वो ध्वनि जो एक बार सुनी हमने
इस जीवन की एकांकी
जो एक बार बुनी हमने

इस मृदुल कोमल मन मे
स्वेत वस्त्रों मे थे तुम उस दिवा
ताजा वो एहसास आज भी
जो चढ़ा गए थे उस दिवा

क्षितिज पर उस नीले अम्बर के
झूल रहे हो पुष्प डाली से
जो खिला है आज भी दुआ मे
स्नेह और उपकार से माली के

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/04/2016

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