‘गज़लों में गज़ल’ – कविता

गज़लों में गज़ल, क्या चहल-पहल, होती है जब वो गाते हैं,
एक लता वृक्ष की पर बैठे वो प्यार का गीत सुनाते हैं,
वो ठंडी-ठंडी तेज़ पवन को मधुर-मधुर महकाते हैं,
चालों से चाल मिला कर के, वो गगन चूमते जाते हैं।।

न क्रोध-चाव,न द्वेष-दाव,बस भाव प्यार के हैं मन में,
कविता का रुख बदलदें जो,ये भाव वही हैं,एक क्षण में,
एक परिवार-सा है उनका, जो साथ उड़ानें भरता है,
अपने प्रेम की ध्वनि सुनाकर,आकाश प्रलोभित करता है,
सुनकर गीत उनका ये,कुछ तो बदल गया मन में,
प्रतिक्रिया कुछ तो बदली-सी,उभर रही है इस तन में,
अब नाच रहा है दिल मेरा,जैसे घुँगरू छन-छनाते हैं……||

2 Comments

  1. योगेश कुमार 'पवित्रम' योगेश कुमार 'पवित्रम' 15/04/2016
  2. Manish sharma 24/07/2016

Leave a Reply