रिश्ते भूल गया दूर हो के ||ग़ज़ल||

रिश्ते भूल गया दूर हो के |
क्यों अँधेरा ज़िंदगी नूर हो के |

जीना तू तो भूल ही गया ,
दौलत के नशे में चूर हो के |

क्यों तूने अपना घर उजाडा ,
किस बात से मजबूर हो के |

आज़ाद नहीं खुला आसमा में ,
तू दुनिया में मशहूर हो के |

क्या मोड़ आया है ज़िंदगी का ,
काट रहे है सजा बेकसूर हो के |

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 16/04/2016
  2. Saviakna Saviakna 19/04/2016

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