लम्हे

इक रोज़ लम्हे हाथों से फिसल गए
जैसे कभी अपने न थे
जैसे उनमें कोई जिया न था
वो जो ख़्वाब पलकों में थे
आंसुओं में धुल चुके थे
इक रोज़ मुझे ख़बर हुई
वो लम्हे नहीं थे
मुट्ठी भर रेत थी।

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 13/04/2016

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