ग़ज़ल —सुहाना प्यार का मंजर

ग़ज़ल –सुहाना प्यार का मंजर !!

सुहाना प्यार का मंजर क्यों बर्बाद करती हो !
नज़र आता नहीँ या नज़रंदाज़ करती हो !!

मस्त जवानी छाई जो ढल जायेगी इक दिन !
इठलाते जौवन पर क्यों इतना नाज़ करती हो !!

प्यार करने की घड़ी ये पावन आई है !
कुबूलो प्यार का तोफा मना क्यों आज करती हो !

अनुज ” इंदवार “

6 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA RAJ KUMAR GUPTA 09/04/2016
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/04/2016
  3. Vimal Kumar Shukla Vimal Kumar Shukla 10/04/2016
  4. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 11/04/2016
  5. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 11/04/2016
  6. C.M. Sharma babucm 12/04/2016

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