हासिल-ए-इश्क

हम कहते रहे शिकवे गुजरे हर कदम
वो वक्त की बहारों में बदलते चल दिये,
जख्म उस रोज गहरे यूं ही ना हुए
दर्द उनके हमने अपने नाम जब कर दिये।
चांद की तन्हाईयों में ढूंढा था उन्हें
राह बेगानी के जाने संग क्यों वो गये,
नींदों में मुस्कुराहटों के तराने हैं मगर
हुस्न ख्वाबों में बिखरा कर हंस क्यों दिये।
इश्क की सांस चढ़ती रही धड़कनों में
मंजर दिलों का वो दिलकश करते गये
झूमने लगे गुलशनों में हम दिवाने हो कर
वो कांटों की सोहबत में कातिल हो गये।

…………. कमल जोशी …………

One Response

  1. Er. Anuj Tiwari"Indwar" Er. Anuj Tiwari"Indwar" 11/04/2016

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