आरोहण

उस दिन बैठी हुई थी
तुम अपने नयनों को झुकाये
एकदम शांत व्याकुल
मन में शून्य भाव लिये
कितनी खूबसूरत थी तुम
और वो पल भी
मानो छुई मुई कह रही हो
चलो हटो छुना न मुझे,
मुस्कान फैल रही है
तुम्हारी चारों दिशाओं में
तुम्हारे केशों का लहराना
दिन ढल गया लगता है
मन कह रहा है
जा पालकी सजा और
ले जा सदा के लिये उसे
बना ले अपनी दुनिया का सागर,
बुन रहा होंठों का चुम्बन
तेरा मधुर सम्मोहन
मन की व्याकुलता का दर्शन
सीमा में बंधकर
असीम होने का आंदोलन
उस क्षण की सोच
जब सूर्य कर रहा होगा
सात अश्वों संग
धरा पर अपने विजय रथ का
आरोहण।
…… कमल जोशी ……

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  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016

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