मैं और वह पल

क्या सोच रहा मैं इस पल
आने वाला है वह दिन
जब उतर आओगी तुम
मेरे जीवन में
मंद बहती पवन की तरह
ऊपर होगा नीला आसमान
सुस्ताने को
बिखरी होंगी तारों और
जुगनुओं की चमक
तुम देख लेना उस क्षण को
घर के आंगन में
गूंज रही होंगी कुछ आवाजें
पेड़ पत्तियों की तरह
पास दूर उड़ रही होंगी
पंछी और तितलियां
बसंत का उन्माद भी होगा
चांद सितारों संग
जीवन की हलचल का हिस्सा बांटने
प्यार जो बनता बचपन पर
नहीं यौवन न जीवन भर
कई आवाजें आनी शेष हैं
कुछ अदृश्य इमारतें भी
मगर जीवन के समक्ष
एक विचित्र मुश्किल
उम्मीद का विकल्प नहीं
शायद प्रेम नहीं
जिसकी लालसा
समय के साथ फैलती जड़ों
गहराते जाते सागर के समान है।

……… कमल जोशी ……….

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/04/2016

Leave a Reply